भारतीय सेना की महिला अधिकारी
– फोटो : PTI

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सुप्रीम कोर्ट ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) की 19 महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन का लाभ देने के लिए दायर याचिका पर विचार करने से गुरुवार को इनकार कर दिया। ये महिला अधिकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा फरवरी में इस मामले पर दिए निर्णय में तय कट-ऑफ तारीख यानी 17 फरवरी के बाद सेवानिवृत्ति हुई थीं।

अपने निर्णय में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसफ ने लिखा कि इन अधिकारियों द्वारा मांगी गई राहत पर विचार करना कोर्ट के निर्णय पर पुनर्विचार करने जैसा होगा। ऐसा किया तो आने वाले बैच की सैन्य अधिकारी भी यही राहत मांग सकती हैं। 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र को आदेश दिया था कि सेवारत एसएससी महिला सैन्य अधिकारी, चाहे उनकी सेवा के 14 वर्ष या 20 वर्ष पूरे हुए हों, उन्हें स्थायी कमीशन देने पर तीन महीने में विचार करे।

एक बार की राहत के तौर पर यह भी कहा गया कि जो अधिकारी अपनी सेवा के 14 वर्ष पूरे कर चुकी हैं, उन्हें 20 वर्ष पेंशन-योग्य होने तक सेवा जारी रखने के लाभ दिए जाएं। ताजा याचिका पर सुनवाई के दौरान सैन्य अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा कि कोर्ट ने कट-ऑफ तारीख 17 फरवरी रखी है, लेकिन केेंद्र सरकार ने स्थायी कमीशन स्वीकारने और कट-ऑफ तारीख स्वीकारने का आदेश जुलाई में जारी किया।

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम कट-ऑफ तारीख में राहत देते हैं तो फिर यह कहीं नहीं रुकेगी। हम कितने पीछे जाएंगे? कब की सीमा रेखा तय करेंगे? यही मेरी चिंता है।

केंद्र ने विरोध कर कहा, तारीख खुली छोड़ी तो आदेश लागू नहीं कर पाएंगे
केंद्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर बालासुब्रमण्यन ने याचिका का विरोध कर कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के दिन यानी 17 फरवरी को 14 वर्ष की सेवा पूरी नहीं की थी। 16 जुलाई को सरकार ने स्थायी कमीशन पर आदेश निकाला, जिसमें कहा गया कि जिन अधिकारियों ने 17 फरवरी को 14 वर्ष का सेवा काल पूरा कर लिया है, उन्हें पेंशन व अन्य लाभ मिलेंगे। अब अगर कोर्ट इस तय तारीख को खुला छोड़ती है तो सरकार आदेश लागू नहीं करवा सकेगी।

कोर्ट ने याचीगण के वकील से कहा कि अगर वे उन्हें राहत देते हैं तो उनके बाद आने वाले बैच के अधिकारियों को भी यह राहत देनी होगी। इसका गंभीर असर होगा। ऐसे में याचिका वापस लेकर स्थाई कमीशन के लिए बने बोर्ड के अधिकारियों के आवेदन पर निर्णय का इंतजार करें। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इस मामले पर निर्णय करना मुश्किल काम है। यह महिला सैन्य अधिकारी देश की सेवा में लगी हैं, हम उनके लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन कहीं तो सीमा तय करनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि
17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में महिला सैन्य अधिकारियों को स्थाई कमीशन और कमान पोस्टिंग देने के निर्देश दिए थे। उसने लैंगिक रूढ़िवादिता और महिलाओं से भेदभाव पर आधारित केंद्र सरकार के महिला अधिकारियों की शारीरिक सीमा के तर्क को नकारा था। केंद्र द्वारा 25 फरवरी 2019 को सेना की 10 शाखाओं में एसएससी की महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिए बनाई नीति को कोर्ट ने स्वीकार करते हुए कहा था कि स्थायी कमीशन का विकल्प सभी महिला अधिकारियों को दिया जाएगा।

अगर वे इसे नहीं लेती हैं, तो जिन अधिकारियों ने 14 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें 20 वर्ष की पेंशन योग्य सेवा जारी रखने का पात्र माना जाए। 20 वर्ष से अधिक सेवा पूरी कर चुकी अधिकारी, जिन्हें स्थायी कमीशन नहीं दिया गया, वे नीतिगत निर्णय के तहत पेंशन पर सेवानिवृत्त होंगी।

उस समय भारतीय सेना में अधिकारियों के 50,266 पद थे, जिनमें से 9,441 खाली थे। वहीं 1,653 महिला सैन्य अधिकारी थीं, जो कुल सैन्य अधिकारियों का चार प्रतिशत से भी कम है। इनमें 77 ने 20 वर्ष से अधिक सेवा की थी, 255 का सेवाकाल 14 से 20 वर्ष के बीच था।

सुप्रीम कोर्ट ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) की 19 महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन का लाभ देने के लिए दायर याचिका पर विचार करने से गुरुवार को इनकार कर दिया। ये महिला अधिकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा फरवरी में इस मामले पर दिए निर्णय में तय कट-ऑफ तारीख यानी 17 फरवरी के बाद सेवानिवृत्ति हुई थीं।

अपने निर्णय में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसफ ने लिखा कि इन अधिकारियों द्वारा मांगी गई राहत पर विचार करना कोर्ट के निर्णय पर पुनर्विचार करने जैसा होगा। ऐसा किया तो आने वाले बैच की सैन्य अधिकारी भी यही राहत मांग सकती हैं। 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र को आदेश दिया था कि सेवारत एसएससी महिला सैन्य अधिकारी, चाहे उनकी सेवा के 14 वर्ष या 20 वर्ष पूरे हुए हों, उन्हें स्थायी कमीशन देने पर तीन महीने में विचार करे।

एक बार की राहत के तौर पर यह भी कहा गया कि जो अधिकारी अपनी सेवा के 14 वर्ष पूरे कर चुकी हैं, उन्हें 20 वर्ष पेंशन-योग्य होने तक सेवा जारी रखने के लाभ दिए जाएं। ताजा याचिका पर सुनवाई के दौरान सैन्य अधिकारियों की ओर से अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा कि कोर्ट ने कट-ऑफ तारीख 17 फरवरी रखी है, लेकिन केेंद्र सरकार ने स्थायी कमीशन स्वीकारने और कट-ऑफ तारीख स्वीकारने का आदेश जुलाई में जारी किया।

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम कट-ऑफ तारीख में राहत देते हैं तो फिर यह कहीं नहीं रुकेगी। हम कितने पीछे जाएंगे? कब की सीमा रेखा तय करेंगे? यही मेरी चिंता है।

केंद्र ने विरोध कर कहा, तारीख खुली छोड़ी तो आदेश लागू नहीं कर पाएंगे
केंद्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर बालासुब्रमण्यन ने याचिका का विरोध कर कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के दिन यानी 17 फरवरी को 14 वर्ष की सेवा पूरी नहीं की थी। 16 जुलाई को सरकार ने स्थायी कमीशन पर आदेश निकाला, जिसमें कहा गया कि जिन अधिकारियों ने 17 फरवरी को 14 वर्ष का सेवा काल पूरा कर लिया है, उन्हें पेंशन व अन्य लाभ मिलेंगे। अब अगर कोर्ट इस तय तारीख को खुला छोड़ती है तो सरकार आदेश लागू नहीं करवा सकेगी।


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