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एन. कुप्पूस्वामी 69 वर्ष के हो चुके हैं। वे दिल्ली के आईटीओ पर स्थित उस अन्ना नगर कॉलोनी के प्रधान हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के अंदर हटाने का आदेश दे दिया है। कुप्पूस्वामी बताते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कालोनी के 1500 झुग्गियों में रहने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रातों की नींद उड़ गई है। लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके रहने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कहां और कैसे की जाएगी। कोरोना काल में उनकी नौकरियां और कामकाज पहले ही खत्म हो चुके हैं, अब सिर से छत छिनने का भी समय आ गया है। ऐसे में अब उनका गुजारा कैसे होगा, यह सोच-सोच कर लोग परेशान हैं।

आईटीओ के बेहद महत्वपूर्ण इलाके तिलक ब्रिज के पास लगभग 50 साल पहले गरीब-मजदूर वर्ग के लोगों ने अस्थाई तौर पर रहना शुरू किया था, जो धीरे-धीरे दस हजार परिवारों का ठिकाना बन गया। कई बार इन्हें दूसरी जगह बसाने का प्रयास भी किया गया, लेकिन यह सफल नहीं हो सका। कई बार यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया। लेकिन इन झुग्गियों को हटाने का प्रयास किसी न किसी अड़चन से टलता रहा। लेकिन बुधवार के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद यहां के रहने वाले लोगों को भी लगने लगा है कि अब यहां आगे रहना संभव नहीं होगा।

झुग्गी के बदले मिली जमीन बेचकर दोबारा आ गए

कुप्पूस्वामी ने बताया कि दिल्ली मेट्रो बनने के समय यहां की लगभग तीन दर्जन झुग्गियों को तोड़ा गया था। इन परिवारों को रहने के लिए वैकल्पिक जगह भी दी गई थी, लेकिन लोग उस जमीन को बेचकर फिर से इसी जगह पर आकर नई झुग्गियां डालकर रहने लगे। लोगों की शिकायत है कि उन्हें नरेला और छतरपुर जैसे दूर इलाकों में रहने के लिए जगह दी गई थी, जहां उनके लिए कोई काम उपलब्ध नहीं हो सकता था। ऐसे में मजबूरन उन्हें वहां से हटना पड़ा।

छोटे-छोटे कारोबार भी

अन्ना नगर के रतन पाल ने बताया कि देश के लगभग हर राज्य से आने वाले गरीब किराये की बचत के लिए इन झुग्गियों में रहना शुरू कर देते हैं। ये लोग आसपास के इलाकों में पटरियों पर सामान बेचना, घरों में साफ-सफाई का काम करना या दिहाड़ी मजदूरों के रूप काम करते हैं। लोगों की चिंता है कि अगर वे यहां से कहीं दूर चले जाते हैं तो वहां उनके लिए काम करने का कोई अवसर नहीं उपलब्ध होगा। अनेक लोगों ने इन झुग्गियों में ही सब्जी, दूध बेचने की दुकानें खोल रखी हैं। अगर कालोनी हटाई जाती है, तो इन लोगों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित होने वाली है जो पहले से ही कोरोना काल में बेहद तंग चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिया आदेश

1985 के एमसी मेहता मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में 140 किलोमीटर लंबाई में फैली रेलवे की पटरियों के किनारे 48000 झुग्गियां बनाई जा चुकी हैं। 70 किमी लंबाई में ये झुग्गियां बेहद सघन हो चुकी हैं, जो चिंता का कारण बन गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय एमसी मेहता मामले के अंतर्गत समय-समय पर दिल्ली को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए अलग-अलग आदेश जारी करती रहती हैं।

इस फैसले के लिए जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्णमुरारी की बेंच ने उत्तर रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी एके यादव की रिपोर्ट का संज्ञान लिया। रिपोर्ट में बताया गया था कि राजधानी में रेल पटरियों के आसपास बनी झुग्गियां अनेक दृष्टि से बड़ी समस्या बनती जा रही हैं।

दिल्ली के तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन के आसपास हजारों की संख्या में अवैध झुग्गियां प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुकी हैं। इसके अलावा सेवानगर, इंद्रपुरी, आनंद पर्वत, सदर बाजार, शास्त्री पार्क, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, शहादरा और अन्य जगहों पर हजारों झुग्गियां बस गई हैं।

सार

  • दिल्ली में रेलवे पटरियों के किनारे बसी 48 हजार झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने का आदेश
  • कोई राजनीतिक हस्तक्षेप, स्थगन आदेश जारी करने पर रोक
  • लोगों को हटाने का 70 फीसदी खर्च रेलवे, 30 फीसदी राज्य सरकार उठाएगी

विस्तार

एन. कुप्पूस्वामी 69 वर्ष के हो चुके हैं। वे दिल्ली के आईटीओ पर स्थित उस अन्ना नगर कॉलोनी के प्रधान हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के अंदर हटाने का आदेश दे दिया है। कुप्पूस्वामी बताते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कालोनी के 1500 झुग्गियों में रहने वाले लगभग 10 हजार लोगों की रातों की नींद उड़ गई है। लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनके रहने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कहां और कैसे की जाएगी। कोरोना काल में उनकी नौकरियां और कामकाज पहले ही खत्म हो चुके हैं, अब सिर से छत छिनने का भी समय आ गया है। ऐसे में अब उनका गुजारा कैसे होगा, यह सोच-सोच कर लोग परेशान हैं।

आईटीओ के बेहद महत्वपूर्ण इलाके तिलक ब्रिज के पास लगभग 50 साल पहले गरीब-मजदूर वर्ग के लोगों ने अस्थाई तौर पर रहना शुरू किया था, जो धीरे-धीरे दस हजार परिवारों का ठिकाना बन गया। कई बार इन्हें दूसरी जगह बसाने का प्रयास भी किया गया, लेकिन यह सफल नहीं हो सका। कई बार यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया। लेकिन इन झुग्गियों को हटाने का प्रयास किसी न किसी अड़चन से टलता रहा। लेकिन बुधवार के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद यहां के रहने वाले लोगों को भी लगने लगा है कि अब यहां आगे रहना संभव नहीं होगा।

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