न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
अद्यतित Tue, 05 मई 2020 10:21 AM IST

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हंदवाड़ा मुठभेड़ में शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा को मंगलवार सुबह जयपुर मिलिस्ट्री स्टेशन में अंतिम विदाई दी गई। शहीद को परिजनों ने पुष्प अर्पित करके श्रद्धांजलि दी। अजमेर रोड स्थित पुरानी चुंगी मोक्षधाम में उनकी अंतिम संस्कार किया जाएगा। इससे पहले सोमवार को आशु का पार्थिव शरीर जयपुर हवाईअड्डे पहुंचा था। यहां उनकी पत्नी पल्लवी, बेटी तमन्ना और बड़े भाई पीयूष पहुंचे थे। कर्नल आशुतोष 21 राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट के प्रणोदन अधिकारी थे।

कर्नल आशुतोष की जिद
कर्नल आशुतोष शर्मा कितने जुनूनी थे यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि सेना में शामिल होने के सपने को साकार करने के लिए साढ़े छह साल तक 12 बार वह चयनित होने से चूकते रहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने 13 वें प्रयास में सेना की वो वर्दी हासिल कर ली जिसकी उन्हें तमन्ना थी।

जिसके बारे में थान लेते हैं, पूरा करते हैं
कर्नल शर्मा को याद करते हुए उनके बड़े भाई पीयूष ने कहा कि चाहे जितनी मुश्किल आ जाए वह उस चीज को हासिल करता था जिसके लिए थान लेता था। जयपुर में एक दवा कंपनी में काम करने वाले पीयूष ने कहा, उसके लिए इस पार या उस पार की बात होती थी। उसकी एक मात्र सपना सेना में जाना था और कुछ नहीं।

13 वें प्रयास में सफलता मिली
पीयूष ने बताया, उसने किसी न किसी तरीके से सेना में शामिल होने के लिए भिड़ा रहता है, जब तक कि 13 वें प्रयास में उसे सफलता नहीं मिली। उस दिन के बाद से आशू (कर्नल शर्मा) ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कर्नल शर्मा 2000 के शुरू में सेना में शामिल हुए थे।

‘मुझे कुछ नहीं होगा भैया’
पीयूष ने अपने भाई के साथ एक मई को हुई बातचीत को याद करते हुए कहा, उस दिन राष्ट्रीय राइफल्स का स्थापना दिवस था और उसने हमें बताया कि उन लोगों ने को विभाजित -19 महामारी के बीच कैसे मनाया। मैं उसे कई बार समझाता था और उसका एक ही रटा रटाया जवाब होता था- मुझे कुछ नहीं होगा भइया।

हंदवाड़ा मुठभेड़ में शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा को मंगलवार सुबह जयपुर मिलिस्ट्री स्टेशन में अंतिम विदाई दी गई। शहीद को परिजनों ने पुष्प अर्पित करके श्रद्धांजलि दी। अजमेर रोड स्थित पुरानी चुंगी मोक्षधाम में उनकी अंतिम संस्कार किया जाएगा। इससे पहले सोमवार को आशु का पार्थिव शरीर जयपुर हवाईअड्डे पहुंचा था। यहां उनकी पत्नी पल्लवी, बेटी तमन्ना और बड़े भाई पीयूष पहुंचे थे। कर्नल आशुतोष 21 राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट के प्रणोदन अधिकारी थे।

कर्नल आशुतोष की जिद

कर्नल आशुतोष शर्मा कितने जुनूनी थे यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि सेना में शामिल होने के सपने को साकार करने के लिए साढ़े छह साल तक 12 बार वह चयनित होने से चूकते रहे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने 13 वें प्रयास में सेना की वो वर्दी हासिल कर ली जिसकी उन्हें तमन्ना थी।

जिसके बारे में थान लेते हैं, पूरा करते हैं
कर्नल शर्मा को याद करते हुए उनके बड़े भाई पीयूष ने कहा कि चाहे जितनी मुश्किल आ जाए वह उस चीज को हासिल करता था जिसके लिए थान लेता था। जयपुर में एक दवा कंपनी में काम करने वाले पीयूष ने कहा, उसके लिए इस पार या उस पार की बात होती थी। उसकी एक मात्र सपना सेना में जाना था और कुछ नहीं।

13 वें प्रयास में सफलता मिली
पीयूष ने बताया, उसने किसी न किसी तरीके से सेना में शामिल होने के लिए भिड़ा रहता है, जब तक कि 13 वें प्रयास में उसे सफलता नहीं मिली। उस दिन के बाद से आशू (कर्नल शर्मा) ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कर्नल शर्मा 2000 के शुरू में सेना में शामिल हुए थे।

‘मुझे कुछ नहीं होगा भैया’
पीयूष ने अपने भाई के साथ एक मई को हुई बातचीत को याद करते हुए कहा, उस दिन राष्ट्रीय राइफल्स का स्थापना दिवस था और उसने हमें बताया कि उन लोगों ने को विभाजित -19 महामारी के बीच कैसे मनाया। मैं उसे कई बार समझाता था और उसका एक ही रटा रटाया जवाब होता था- मुझे कुछ नहीं होगा भइया।





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