1962 भारत-चीन युद्ध (प्रतीकात्मक तस्वीर)
– फोटो : ट्विटर

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वास्तविक नियंत्रण रेखावास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी) के करीब चीन की हिमाकत इन दिनों कुछ बढ़ती ही जा रही है। कभी उसके हेलीकॉप्टर आते हैं तो कभी उसके सैनिक पैंगोंग त्सो झील में कारस्तानी कर जाते हैं। हिंदुस्तान चीन की हर हरकत का बखूबी जवाब दे रहा है। दो हफ्ते पहले इसी झील के नजदीक भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प भी हुई थी। ड्रैगन की ओर से भले ही आक्रामकता दिखाई जा रही हो, लेकिन भारत भी धैर्य के साथ तैयारियां कर रहा है। सीमा पर तनाव के बीच 1962 के भारत-चीन युद्ध की यादें ताजा हो रही हैं। चीन ने यह युद्ध ऐसे समय पर छेड़ा था जब भारत उसपर विश्वास करने लगा था और दोस्ती के नए अध्याय लिखे जा रहे थे। इसी दौर हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी बुलंद हुआ था। लेकिन चीन की हरकत ने इस दोस्ती की पीठ पर दगाबाजी का छुरा घोंप दिया। 
 

 

हिंदी-चीनी भाई-भाई, लेकिन बॉर्डर पर दगा

चीन के बड़े नेता माओत्से तुंग ने ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ आंदोलन की असफलता के बाद सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना फिर से नियंत्रण कायम करने के लिए भारत के साथ वर्ष 1962 का युद्ध छेड़ा था, उस समय हिंदी चीनी भाई-भाई नारा छाया रहता था, लेकिन बॉर्डर पर चीन की इस करतूत से हर कोई हैरान था। भारत को कभी यह शक नहीं हुआ कि चीन हमला भी कर सकता है, लेकिन 20 अक्तूबर 1962 को भारत पर हमला हो गया। यह किसी विश्वासघात से कम नहीं था, भारत इस युद्ध के लिए तैयार नहीं था। एक महीने तक चले इस युद्ध के बाद भारत को बड़ा सबक मिला, उसने सेना के आधुनिकीकरण पर काम किया। आज भारत के पास दुश्मनों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए दमखम के साथ साजो-सामान भी है। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ही लता मंगेशकर ने देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाया था, प्रदीप का लिखा यह गाना अमर हो चुका है।

ऐसे हुई भारत-चीन के बीच तनाव की शुरुआत

भारत को 1947 में आजादी मिली और दो साल बाद 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) बना। शुरुआती दिनों में दोनों पड़ोसी देशों के बीच मित्रवत संबंध थे। भारत सरकार की नीति चीन से दोस्ती बढ़ाने की थी। जब चीन दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था, उस समय भी भारत चीन के साथ खड़ा था। जापान के साथ किसी वार्ता में भारत सिर्फ इस वजह से शामिल नहीं हुआ क्योंकि चीन आमंत्रित नहीं था। 1954 में भारत-चीन के बीच शांतिपूर्ण संबंधों को लेकर पंचशील समझौता हुआ, इसी समझौते के तहत भारत ने तिब्बत में चीन शासन को स्वीकार किया। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया। मगर 1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा। यही भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह बना।

पैंगोंग त्सो झील

  • इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में पड़ता है, जबकि 90 किलोमीटर क्षेत्र चीन में आता है।
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा इस झील के बीच से गुजरती है।
  • पश्चिमी सेक्टर में चीन की और से अतिक्रमण के एक तिहाई मामले इसी झील के पास होते हैं।
  • गलवां घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चीन में पड़ता है और भारत-चीन सीमा के नजदीक स्थित है।
  • यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अक्साई चीन को भारत से अलग करती है।
  • ये पाकिस्तान, चीन के शिनजियांग और लद्दाख की सीमा के साथ लगा हुआ है।
  • 1962 की जंग के दौरान भी गलवां नदी का यह क्षेत्र जंग का प्रमुख केंद्र रहा था।
  • अरुणाचल प्रदेश के तवांग को चीन तिब्बत का हिस्सा मानता है।
  • तवांग और तिब्बत में सांस्कृतिक समानता काफी अधिक है।
  • 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों के बीच समझौता हुआ था।
  • समझौते में प्रदेश के उत्तरी हिस्से तवांग और दक्षिणी हिस्से को भारत का हिस्सा माना लिया गया था।

2017 में दोकलम को लेकर भारत-चीन के बीच जमकर विवाद हुआ था। मामला तब शुरू हुआ था जब भारत ने पठारी क्षेत्र दोकलम में चीन के सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया। बाद में मामला करीब दो महीनों के बाद बातचीत के स्तर पर सुलझा था। दोकलम मुख्य रूप से चीन और भूटान के बीच का विवाद है, लेकिन सिक्किम बॉर्डर के नजदीक ही पड़ता है। भूटान और चीन दोनों इस इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत भूटान के दावे का समर्थन करता है।

नाथूला हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम राज्य और दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी को जोड़ता है। नाथूला भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से होकर चीनी तिब्बत क्षेत्र में स्थित कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा के लिए भारतीयों का जत्था गुजरता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। साल 2006 में कई द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के बाद नाथूला को खोला गया। 1890 की संधि के तहत भारत और चीन के बीच नाथूला सीमा पर कोई विवाद नहीं है।

वास्तविक नियंत्रण रेखावास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी) के करीब चीन की हिमाकत इन दिनों कुछ बढ़ती ही जा रही है। कभी उसके हेलीकॉप्टर आते हैं तो कभी उसके सैनिक पैंगोंग त्सो झील में कारस्तानी कर जाते हैं। हिंदुस्तान चीन की हर हरकत का बखूबी जवाब दे रहा है। दो हफ्ते पहले इसी झील के नजदीक भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प भी हुई थी। ड्रैगन की ओर से भले ही आक्रामकता दिखाई जा रही हो, लेकिन भारत भी धैर्य के साथ तैयारियां कर रहा है। सीमा पर तनाव के बीच 1962 के भारत-चीन युद्ध की यादें ताजा हो रही हैं। चीन ने यह युद्ध ऐसे समय पर छेड़ा था जब भारत उसपर विश्वास करने लगा था और दोस्ती के नए अध्याय लिखे जा रहे थे। इसी दौर हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी बुलंद हुआ था। लेकिन चीन की हरकत ने इस दोस्ती की पीठ पर दगाबाजी का छुरा घोंप दिया। 

 

 

हिंदी-चीनी भाई-भाई, लेकिन बॉर्डर पर दगा

चीन के बड़े नेता माओत्से तुंग ने ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ आंदोलन की असफलता के बाद सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना फिर से नियंत्रण कायम करने के लिए भारत के साथ वर्ष 1962 का युद्ध छेड़ा था, उस समय हिंदी चीनी भाई-भाई नारा छाया रहता था, लेकिन बॉर्डर पर चीन की इस करतूत से हर कोई हैरान था। भारत को कभी यह शक नहीं हुआ कि चीन हमला भी कर सकता है, लेकिन 20 अक्तूबर 1962 को भारत पर हमला हो गया। यह किसी विश्वासघात से कम नहीं था, भारत इस युद्ध के लिए तैयार नहीं था। एक महीने तक चले इस युद्ध के बाद भारत को बड़ा सबक मिला, उसने सेना के आधुनिकीकरण पर काम किया। आज भारत के पास दुश्मनों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए दमखम के साथ साजो-सामान भी है। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि पर ही लता मंगेशकर ने देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गाया था, प्रदीप का लिखा यह गाना अमर हो चुका है।

ऐसे हुई भारत-चीन के बीच तनाव की शुरुआत

भारत को 1947 में आजादी मिली और दो साल बाद 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) बना। शुरुआती दिनों में दोनों पड़ोसी देशों के बीच मित्रवत संबंध थे। भारत सरकार की नीति चीन से दोस्ती बढ़ाने की थी। जब चीन दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था, उस समय भी भारत चीन के साथ खड़ा था। जापान के साथ किसी वार्ता में भारत सिर्फ इस वजह से शामिल नहीं हुआ क्योंकि चीन आमंत्रित नहीं था। 1954 में भारत-चीन के बीच शांतिपूर्ण संबंधों को लेकर पंचशील समझौता हुआ, इसी समझौते के तहत भारत ने तिब्बत में चीन शासन को स्वीकार किया। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया। मगर 1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा। यही भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह बना।


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