• बच्चाें के अच्छे काम की प्रशंसा करें, झगड़ाें का खुद समाधान निकालने के लिए प्राेत्साहित करें
  • विशेषज्ञ मानते हैं कि 8 साल से ब्लेटे किड्स में मुश्किल बातचीत करने का काशल नहीं हाएता

क्रिस्टीना कैरेन

11 मई, 2020, सुबह 06:01 बजे IST

वॉशिंगटन। महीनेें की साेशल डिस्टेंसिंग के बाद परिजन की तरह बच्चे भी हताश-परेशान हाए गए हैं। किसी घर में बच्चे इस बात के लिए लड़ते हुए हैं कि फलां कुर्सी पर काैन बैठेगा, तो कहीं मनपसंद टीवी सीरियल देखने के लिए झगड़ा होता है। पसंदीदा खाने के लिए ताे युद्ध हाे जाता है। यह घर-घर की कहानी है।

लाकडाउन में बच्चाें के ये झगड़े परिजन के सब्र का इम्तेहान हैं, लेकिन ये झगड़ाें का समाधान करने के मौके भी हाए सकते हैं। सिबलिंग रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स और बास्टन की नाॅर्डस्टर्न यूनिवर्सिटी के एप्लाइड साइकालेलाजी के प्राे। लाॅरी क्रैमर बताती हैं, से 8 साल से ब्लेटे किड्स में मुश्किल, भावनाभरी बातचीत करने का काॅलेज नहीं हाएता। इसलिए उनका मार्गदर्शन करें। इसके लिए यह सटीक समय है। ‘

एरिज़ेना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्राे। किम्बर्ले अपडेग्राफ कहते हैं, ‘जब दाए भाई झगड़ते हैं या एक-दूसरे काे नुकसान पहुंचते हैं, ताे हम हस्तक्षेपल देकर समाधान पेश कर देते हैं और उनके तर्क-कुतर्क काे बंद करवा देते हैं, लेकिन इससे उनकी खुद की स्नेह काढने के लिए मंथन करने लगे। की क्षमता पर असर पड़ता है। वे परिजन पर निर्भर रहना शुरू कर रहे हैं। ‘वे कहते हैं,’ हमारा अंतिम लक्ष्य उन्हें झगड़ाें का खुद हल निकालने के लिए प्राेत्साहित करना हाएना चाहिए। ‘

विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चाें की लड़ाई पारिवारिक कायदाें और नैतिक मूल्य से परिचित करवाने का भी अवसर है। जैसे आप उन्हें बगैर हस्तक्षेप के दिए सुनने का महत्व बता सकते हैं। डाॅ। अपडेग्राफ कहते हैं, एक-दूसरे काे नुकसान पहुंचते समय बच्चे अक्सर हमारा ध्यान खींचते हैं, लेकिन जब वे अच्छे से खेल रहे हाेते हैं ताे हम नजरअंदाज कर देते हैं। बेहतर यह है कि ऐसे लक्षणहाराेंड का आभार प्रकट करें जायें आप अक्सर देखना चाहते हैं। जैसे एक-दूसरे से बांट खाना, साथ खेलना आदि।

ये समाधान भी मदद करेंगे

  • पूरे दिन में कुछ पल ऐसे निकाले जा सकते हैं जब भाई या बहन किसी गतिविधि में एक-दूसरे की मदद करें। इससे वे एक-दूसरे काे देखकर सीख सकते हैं।
  • बच्चे की भावनाओं के अनुरूप उन्हें नए-नए शब्द सिखा सकते हैं।
  • चैता तकनीक भी अपना सकते हैं। आपत्ति के रूप में पूरी तरह से बातचीत काे नियंत्रण में लेते हैं, लेकिन समाधान पर बच्चे खुद ही पहुंचते हैं।





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