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बांग्लादेश में अब रेडिमेड कपड़ों की तमाम फैक्ट्रियों ने काम करना शुरू तो कर दिया है, लेकिन यहां काम करने वाले बेहद सहमे हुए हैं, उनका कहना है कि वह अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर जबरन फैक्ट्री आ रहे हैं और संक्रमण के खतरे के बावजूद काम करते हैं। करने को मजबूर हैं। उन्हें मालिकों ने जबरन काम पर आने को मजबूर किया है, जबकि न तो यहां संकाय पहनना मुमकिन है और न ही सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना।

बांग्लादेश में दुनिया के तमाम बड़े ब्रांड के रेडिमेड इंजन बनते हैं और देश के कुल उत्पादन बाजार का 84 प्रतिशत हिस्सा निर्यात हो जाता है। हालांकि सरकार ने इसे इसी शर्त पर चलाने की इजाजत दी है कि निर्देशों का पालन होगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

गार्डियन पेपर ने इस बारे में जो पड़ताल की है, उसमें कहा गया है कि ये फैक्ट्री में केवल गेट पर हाथ धोने या सैनिटरीज़ करने का इंतजाम किया गया है, बाकी न तो संकाय, ग्लव्स या सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन हो रहा है।

गाजीपुर और आशुलिया इलाके की फैक्ट्रियों का जायजा लेने के बाद ये तथ्य सामने आया है कि इन्हें ठसाठस भरी बस में काम पर लाया जाता है और नौकरी बचानेए रखने की मजबूरी की वजह से इन्हें अपना जान जोखिम में डालना पड़ रहा है। तमाम मजदूरों के मुताबिक उनसे कई बीमार हो रहे हैं, लेकिन उनकी जांच की कोई व्यवस्था नहीं है।

बांग्लादेश में अभी कोरोना के करीब 10 हजार मामले सामने आए हैं, 187 मौतें भी हुई हैं। लेकिन दुनिया के तमाम देशों के मुकाबले संक्रमण और मौत के आंकड़े कम होने की वजह से फैक्ट्री मालिकों की हिम्मत बढ़ी है। सरकार पर लगातार ये दबाव डाला जा रहा था कि भारतीय उद्योग को चालू कर दिया जाए। नियम कानून तो बहुत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका पालन कहीं नहीं हो रहा है।

15 की मार्च के बाद 15 मार्च के बाद से काम करना बंद कर दिया गया था, मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया था और लगभग डेढ़ लाख कर्मचारी सड़कों पर थे। आखिरकार वर्तमान में लगभग 1000 फैक्ट्रियों में काम शुरू हो चुका है और तमाम कर्मचारी अपनी रोजी रोटी के लिए काम पर लौट आए हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर न तो फैक्ट्री मालिक चिंतित हैं और न ही सरकार ने कोई कारगर उपाय किया है।

बांग्लादेश में अब रेडिमेड कपड़ों की तमाम फैक्ट्रियों ने काम करना शुरू तो कर दिया है, लेकिन यहां काम करने वाले बेहद सहमे हुए हैं, उनका कहना है कि वह अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर जबरन फैक्ट्री आ रहे हैं और संक्रमण के खतरे के बावजूद काम करते हैं। करने को मजबूर हैं। उन्हें मालिकों ने जबरन काम पर आने को मजबूर किया है, जबकि न तो यहां संकाय पहनना मुमकिन है और न ही सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना।

बांग्लादेश में दुनिया के तमाम बड़े ब्रांड के रेडिमेड इंजन बनते हैं और देश के कुल उत्पादन बाजार का 84 प्रतिशत हिस्सा निर्यात हो जाता है। हालांकि सरकार ने इसे इसी शर्त पर चलाने की इजाजत दी है कि निर्देशों का पालन होगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

गार्डियन पेपर ने इस बारे में जो पड़ताल की है, उसमें कहा गया है कि ये फैक्ट्री में केवल गेट पर हाथ धोने या सैनिटरीज़ करने का इंतजाम किया गया है, बाकी न तो संकाय, ग्लव्स या सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन हो रहा है।

गाजीपुर और आशुलिया इलाके की फैक्ट्रियों का जायजा लेने के बाद ये तथ्य सामने आया है कि इन्हें ठसाठस भरी बस में काम पर लाया जाता है और नौकरी बचानेए रखने की मजबूरी की वजह से इन्हें अपना जान जोखिम में डालना पड़ रहा है। तमाम मजदूरों के मुताबिक उनसे कई बीमार हो रहे हैं, लेकिन उनकी जांच की कोई व्यवस्था नहीं है।

बांग्लादेश में अभी कोरोना के करीब 10 हजार मामले सामने आए हैं, 187 मौतें भी हुई हैं। लेकिन दुनिया के तमाम देशों के मुकाबले संक्रमण और मौत के आंकड़े कम होने की वजह से फैक्ट्री मालिकों की हिम्मत बढ़ी है। सरकार पर लगातार ये दबाव डाला जा रहा था कि भारतीय उद्योग को चालू कर दिया जाए। नियम कानून तो बहुत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका पालन कहीं नहीं हो रहा है।

15 की फैक्ट्रियों ने 15 मार्च के बाद से काम करना बंद कर दिया था, मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया था और लगभग डेढ़ लाख कर्मचारी सड़कों पर थे। आखिरकार वर्तमान में लगभग 1000 फैक्ट्रियों में काम शुरू हो चुका है और तमाम कर्मचारी अपनी रोजी रोटी के लिए काम पर लौट आए हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर न तो फैक्ट्री मालिक चिंतित हैं और न ही सरकार ने कोई कारगर उपाय किया है।





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