अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये की निवेश मांग, विशेषज्ञ सुझाए गए तरीके – अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये के निवेश की मांग, विशेषज्ञों ने बेहतर तरीके से काम किया


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औद्योगिक संगठन एसोचैम के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी सौरभ सान्याल ने कहा है कि देश की आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता है। इस निवेश से न सिर्फ देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बचाना संभव होगा, बल्कि इन क्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों कामगारों के भविष्य की भी रक्षा की जा सकेगी।

इसी तरह की मांग एनआई और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स की ओर से भी की गई है। औद्योगिक संगठनों की यह मांग ऐसे समय में आई है जबकि सरकार सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों को बचाने के लिए आर्थिक पैकेज का एलान करने वाली है।

जहां से पैसा आ सकता है

सौरभ सान्याल ने अमर उजाला से कहा कि देश की आर्थिक गाड़ी को दोबारा पटरी पर दौड़ाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार विश्व बैंक या आईएमएफ के माध्यम से कर्ज ले सकती है।

इस निवेश से औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि बढ़ेगी। फैक्ट्रियों के चलने से करोड़ों मजदूरों-कामगारों के हाथ में पैसा जाएगा। इससे माँग में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी।

सरकार के पास विदेशी मुद्रा के रूप में भी पर्याप्त भंडार है। कुछ समय के लिए वह इस योगदान को 3.5 से 4.5 प्रतिशत तक कम करने की योजना बना ले तो भी इससे अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मात्रा में झोंकी हो सकती है। इससे भी मांग पैदा करने और उद्योगों को चलाने का रास्ता खुल सकता है।

सरकार के पास ईएसआईसी के रूप में लगभग 84 हजार करोड़ रुपये की धनराशि है। लगभग इतना ही पैसा ईपीएफओ में भी जमा है। इस धनराशि में 12 प्रति सरकार और 12 प्रति उद्योग अपना योगदान देते हैं।

सरकार इस पैसे को तीन से छह महीने के लिए उद्योगों को दे सकती है, जिससे वे अपने कर्मचारियों को भुगतान कर सकें। इससे भी मांग में वृद्धि होगी और औद्योगिक कनेक्टिविटी वाले गिरने लगेगी। सरकार के पास उद्योगों को राहत देने के लिए कर राहत और टैक्स जमा करने में कुछ अतिरिक्त समय देने जैसे अन्य उपाय भी किए जा सकते हैं।

श्रम कानूनों में आरक्षण

पहले से ही बकाया झेल रहे उद्योगों को 24 मार्च से घोषित लॉकडाउन में भी मजदूरों को वेतन देने और उनकी व्यवस्था देखने के लिए कहा गया। ‘ लेकिन कई कमजोर संगठन टूट गए और उनके कर्मचारियों का वेतन नहीं मिला।

इससे लाखों लोगों की छंटनी हुई और बेरोजगारी से मजदूरों के हाथ में पैसे की कमी हुई। इससे मांग में भी भारी कमी दर्ज की गई। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि आर्थिक पैकेज के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के हितों की रक्षा की जा सकती है।

श्रम कानून के समापन पर श्रमिक संगठन नाराज

भारतीय मजदूर संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनीश मिश्रा ने कहा कि उद्योगों को राहत देने के नाम पर गरीब मजदूरों के हितों की अनदेखी की जा रही है। शुक्रवार को वे गृह मंत्री अमित शाह से इस पर विरोध जता चुके हैं। अगर सरकार ने मजदूरों के हित में कदम नहीं उठाए, तो वे इस पर व्यापक रणनीति बनाकर विरोध दर्ज कराएंगे।

द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने कहा कि को विभाजित जैसी स्थिति में जब मजदूरों के हितों की सबसे ज्यादा रक्षा की जानी चाहिए, उन्हें उद्योगों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है।

अब न तो उनकी नीतियों के लिए कोई आवाज उठाई जा सकती है और न ही उनके सिद्धांतों की चोटों पर कोई कानूनी मदद ली जा सकती है। यह देश के करोड़ों मजदूरों के हितों के साथ खिलवाड़ है।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि केंद्र सरकार खुद को मजदूरों और गरीबों की हितैषी बताती है। लेकिन उसका हर फैसला उद्योगपतियों को बचाने वाला उठ रहा है।

बड़े-बड़े उद्योग संगठनों को लाखों करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया जा रहा है, जबकि उसी दौरान श्रम कानूनों में बदलाव करके गरीबों के हितों को चोट पहुंचाई जा रही है।

सरकार को समझना चाहिए कि संतुष्ट मजदूर उसके लिए ज्यादा उत्पादक और मांग बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

क्या कहते हैं कानून

श्रम कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता अमित सिन्हा के मुताबिक राज्यों ने अध्यादेश के जरिए अधिकतम तीन साल के लिए श्रम कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन इस दौरान भी न्यूनतम मजदूरी, बाल मजदूरी निषेध, सुरक्षा और बंधुआ मजदूरी जैसे कानूनों को जारी रखने के विषय में निर्णय लिया गया है।

कुछ स्थानों पर काम के घंटे बढ़ाए गए हैं, लेकिन इस विषय में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हो सकते हैं। कुछ राज्यों ने इसके लिए अतिरिक्त वेतन देने की बात कह दी है।

सार

  • अर्थव्यवस्था और श्रमिक, दोनों को बचाने के लिए भारी निवेश ही एकमात्र रास्ता है
  • एसोचैम ने कहा- निवेश के बाद देश की आर्थिक वृद्धि चार से पांच प्रतिशत बनाए रखना संभव होगा
  • मजदूर कानून को निलंबित करने पर लेबर यूनियन के खिलाफ, भारतीय मजदूर संघ ने जताया विरोध

विस्तार

औद्योगिक संगठन एसोचैम के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी सौरभ सान्याल ने कहा है कि देश की आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता है। इस निवेश से न सिर्फ देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बचाना संभव होगा, बल्कि इन क्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों कामगारों के भविष्य की भी रक्षा की जा सकेगी।

इसी तरह की मांग एनआई और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स की ओर से भी की गई है। औद्योगिक संगठनों की यह मांग ऐसे समय में आई है जबकि सरकार सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों को बचाने के लिए आर्थिक पैकेज का एलान करने वाली है।

जहां से पैसा आ सकता है

सौरभ सान्याल ने अमर उजाला से कहा कि देश की आर्थिक गाड़ी को दोबारा पटरी पर दौड़ाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार विश्व बैंक या आईएमएफ के माध्यम से कर्ज ले सकती है।

इस निवेश से औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि बढ़ेगी। फैक्ट्रियों के चलने से करोड़ों मजदूरों-कामगारों के हाथ में पैसा जाएगा। इससे माँग में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी।

सरकार के पास विदेशी मुद्रा के रूप में भी पर्याप्त भंडार है। कुछ समय के लिए वह इस योगदान को 3.5 से 4.5 प्रतिशत तक कम करने की योजना बना ले तो भी इससे अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मात्रा में झोंकी हो सकती है। इससे भी मांग पैदा करने और उद्योगों को चलाने का रास्ता खुल सकता है।

सरकार के पास ईएसआईसी के रूप में लगभग 84 हजार करोड़ रुपये की धनराशि है। लगभग इतना ही पैसा ईपीएफओ में भी जमा है। इस धनराशि में 12 प्रति सरकार और 12 प्रति उद्योग अपना योगदान देते हैं।

सरकार इस पैसे को तीन से छह महीने के लिए उद्योगों को दे सकती है, जिससे वे अपने कर्मचारियों को भुगतान कर सकें। इससे भी मांग में वृद्धि होगी और औद्योगिक कनेक्टिविटी वाले गिरने लगेगी। सरकार के पास उद्योगों को राहत देने के लिए कर राहत और टैक्स जमा करने में कुछ अतिरिक्त समय देने जैसे अन्य उपाय भी किए जा सकते हैं।

श्रम कानूनों में आरक्षण

पहले से ही बकाया झेल रहे उद्योगों को 24 मार्च से घोषित लॉकडाउन में भी मजदूरों को वेतन देने और उनकी व्यवस्था देखने के लिए कहा गया। ‘ लेकिन कई कमजोर संगठन टूट गए और उनके कर्मचारियों का वेतन नहीं मिला।

इससे लाखों लोगों की छंटनी हुई और बेरोजगारी से मजदूरों के हाथ में पैसे की कमी हुई। इससे मांग में भी भारी कमी दर्ज की गई। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि आर्थिक पैकेज के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के हितों की रक्षा की जा सकती है।

श्रम कानून के समापन पर श्रमिक संगठन नाराज

भारतीय मजदूर संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनीश मिश्रा ने कहा कि उद्योगों को राहत देने के नाम पर गरीब मजदूरों के हितों की अनदेखी की जा रही है। शुक्रवार को वे गृह मंत्री अमित शाह से इस पर विरोध जता चुके हैं। अगर सरकार ने मजदूरों के हित में कदम नहीं उठाए, तो वे इस पर व्यापक रणनीति बनाकर विरोध दर्ज कराएंगे।

द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने कहा कि को विभाजित जैसी स्थिति में जब मजदूरों के हितों की सबसे ज्यादा रक्षा की जानी चाहिए, उन्हें उद्योगों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है।

अब न तो उनकी नीतियों के लिए कोई आवाज उठाई जा सकती है और न ही उनके सिद्धांतों की चोटों पर कोई कानूनी मदद ली जा सकती है। यह देश के करोड़ों मजदूरों के हितों के साथ खिलवाड़ है।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि केंद्र सरकार खुद को मजदूरों और गरीबों की हितैषी बताती है। लेकिन उसका हर फैसला उद्योगपतियों को बचाने वाला उठ रहा है।

बड़े-बड़े उद्योग संगठनों को लाखों करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया जा रहा है, जबकि उसी दौरान श्रम कानूनों में बदलाव करके गरीबों के हितों को चोट पहुंचाई जा रही है।

सरकार को समझना चाहिए कि संतुष्ट मजदूर उसके लिए ज्यादा उत्पादक और मांग बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

क्या कहते हैं कानून

श्रम कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता अमित सिन्हा के मुताबिक राज्यों ने अध्यादेश के जरिए अधिकतम तीन साल के लिए श्रम कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन इस दौरान भी न्यूनतम मजदूरी, बाल मजदूरी निषेध, सुरक्षा और बंधुआ मजदूरी जैसे कानूनों को जारी रखने के विषय में निर्णय लिया गया है।

कुछ स्थानों पर काम के घंटे बढ़ाए गए हैं, लेकिन इस विषय में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हो सकते हैं। कुछ राज्यों ने इसके लिए अतिरिक्त वेतन देने की बात कह दी है।





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