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कोरोना महामारी से सामना के लिए सांसद के स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम के तहत आवंटित राशि के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार के फैसले पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। केंद्र सरकार ने महामारी से निपटने के लिए आवंटित धन को हटाने का फैसला दिया था।

वहीं हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसने सरकार के इस फैसले को चुनौती दी थी। आठ अप्रैल को जारी सर्कुलर को लेकर जनहित याचिका दायर की गई थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने सर्कुलर जारी किया, जिसके तहत सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम को 2020-21 और 2021-22 के लिए निलंबित कर दिया गया था।

याचिका में दावा किया गया कि सांसद निधि में से अपने-अपने क्षेत्र में विकास और निर्माण कार्य के लिए फंडों की जरूरत पड़ती है, ऐसे में दो साल के निलंबन को अलग रखना चाहिए। हालांकि मंत्रालय ने इस फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि देश एक महामारी से जूझ रहा है, एमपीवीडी फंड को सार्वजनिक संपत्ति के तौर पर वित्त मंत्रालय में भेजा जा रहा है। इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने मंत्रालय के साथ सहमति जताई और कहा याचिकाकर्ता के तर्क लोगों के हित में नहीं है और इसलिए ओरचिओं के एक लाख रुपये की जमानत राशि बच कर कर ली गई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी की बेंच ने यह फैसला सुनाया।

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि निलंबित करने से नागरिकों के साथ-साथ सांसदों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इस तरह की शिकायत के साथ ना तो अदालत का दरवाजा खटखटाया, इसलिए याचिकाकर्ता के दावे पर कोई जवाब नहीं है। योग्यता नहीं है

कोर्ट ने आगे कहा कि महामारी को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया है वह उचित है। वहीं कोर्ट ने ये भी कहा कि यह जनहित याचिका हमें गलत प्रतीत होती है क्योंकि इसमें जनहित को कोई तत्व नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले को देखते हुए हमें इसे खारिज करने में कोई संकोच नहीं है।

कोरोना महामारी से सामना के लिए सांसद के स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम के तहत आवंटित राशि के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार के फैसले पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। केंद्र सरकार ने महामारी से निपटने के लिए आवंटित धन को हटाने का फैसला दिया था।

वहीं हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसने सरकार के इस फैसले को चुनौती दी थी। आठ अप्रैल को जारी सर्कुलर को लेकर जनहित याचिका दायर की गई थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने सर्कुलर जारी किया, जिसके तहत सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास स्कीम को 2020-21 और 2021-22 के लिए निलंबित कर दिया गया था।

याचिका में दावा किया गया कि सांसद निधि में से अपने-अपने क्षेत्र में विकास और निर्माण कार्य के लिए फंडों की जरूरत पड़ती है, ऐसे में दो साल के निलंबन को अलग रखना चाहिए। हालांकि मंत्रालय ने इस फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि देश एक महामारी से जूझ रहा है, एमपीवीडी फंड को सार्वजनिक संपत्ति के तौर पर वित्त मंत्रालय में भेजा जा रहा है। इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने मंत्रालय के साथ सहमति जताई और कहा याचिकाकर्ता के तर्क लोगों के हित में नहीं है और इसलिए ओरचिओं के एक लाख रुपये की जमानत राशि बच कर कर ली गई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी की बेंच ने यह फैसला सुनाया।

बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि निलंबित करने से नागरिकों के साथ-साथ सांसदों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इस तरह की शिकायत के साथ ना तो अदालत का दरवाजा खटखटाया, इसलिए याचिकाकर्ता के दावे पर कोई जवाब नहीं है। योग्यता नहीं है

कोर्ट ने आगे कहा कि महामारी को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया है वह उचित है। वहीं कोर्ट ने ये भी कहा कि यह जनहित याचिका हमें गलत प्रतीत होती है क्योंकि इसमें जनहित को कोई तत्व नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले को देखते हुए हमें इसे खारिज करने में कोई संकोच नहीं है।





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