• अमेरिकियों ने डर के कारण दवा जमा करना शुरू किया, एफडीए ने जारी की चेतावनी
  • हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीनिन रोगियों को दी जाए, इस पर भी डॉ।-वैज्ञानिक एकमत नहीं

दैनिक भास्कर

11 मई, 2020, दोपहर 01:17 बजे IST

न्यूयॉर्क। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कोरोना संक्रमण के लिए बेहद उपयोगी मानी जा रही मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। विश्वविद्यालय ने लगभग 1400 रोगियों पर की गई एक स्टडी में दावा किया गया है कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन लेने वाले और न लेने वाले रोगियों की स्थिति में बहुत अधिक मामले नहीं पड़ रहे हैं, क्योंकि ये दवा गंभीर रोगियों को बचाने नहीं पा रही है। ये रिपोर्ट न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपी है।

इस स्टडी में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की उस सलाह पर भी आपत्ति उठाई गई है जिसमें उन्होंने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया था। अमेरिकी सरकार ने 19 मार्च को मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली क्लोरोक्वीन को कोरोना के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी दे दी थी।

1400 रोगियों पर दो समूहों में की गई स्टडी

कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन लेने वाले 800 से अधिक रोगियों की तुलना ऐसे 560 रोगियों से की है जिनका इलाज इस दवा की बजाय दूसरे तरीके से किया गया है। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन वाले रोगियों में से कुछ को सिर्फ यही दवा मिली जबकि कुछ रोगियों को एजिथ्रोमाइसिन के साथ मिलकर दी गई थी।

इन दोनों समूहों के अलग-अलग नतीजों में पता चला कि लगभग 1400 मरीजों में से 232 की मौत हो गई और 181 लोगों को वेंटिलेटर पर ले जाना पड़ा। दोनों ही समूहों में ये आंकड़े लगभग बराबर थे। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग के कारण न तो मरने का जोखिम कम हुआ और न ही वेंटिलेटर की जरूरत को कम किया गया।

इस स्टडी को को अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ से फंडिंग मिली थी। अप्रैल में शुरू हुआ यह स्टडी का मकसद यह देखना था कि क्या ये दवाइयों के संपर्क में आने वाले क्यूलाइन वर्कर्स में संक्रमण को रोकने में मदद कर सकता है।

चेतावनी- दवा का फायदा कम, नुकसान ज्यादा

अचानक जीवन रक्षक बननेकर उभरी हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर इन अमेरिकी शोधकर्ताओं की सलाह है कि इन दवाइयों से बहुत नुकसान हो रहा है। वह इसके संभावित गंभीर परिणामों को बता रहे हैं, जिसमें दिल की धड़कन का अचानक से बेकाबू हो जाना भी है और ये मौत का कारण भी बन जाता है।

एफडीए ने भी तापमान अध्ययन के अलावा कोरोनोवायरस संक्रमण के लिए इस दवा के इस्तेमाल को लेकर सचेत किया है। यह चेतावनी इस खबर के बाद आई कि अमेरिकी लोगों ने डर के मारे हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन जमा करना शुरू कर दिया है।

गंभीर रोगियों को यह दवा दी जा रही है

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन अमूमन ऐसे रोगियों को दी जा रही है जो बहुत अधिक हैं। इसके लिए दुनिया में व्यापक रूप से अपनाए जा रहे तरीकों पर ही अमल हो रहा है, लेकिन कोई बहुत अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे क्योंकि मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।

इसका इस्तेमाल मरीज को भर्ती किए जाने के दो दिनों के भीतर शुरू हुआ। क्योंकि पहले के अध्ययनों के कुछ आलोचकों ने कहा था कि हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन शुरुआत में ही दी जानी चाहिए, न कि रोगी की स्थिति बिगड़ने के बाद।

ट्रम्प के दबाव में शुरू हुआ इस्तेमाल किया

पत्र अनुसंधान रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि मलेरिया और इम्यून सिस्टम की खतरनाक बीमारी ल्यूपस दवा का कॉम्बिनेशन कोरोना में भी प्रभावी हो सकता है। जानकारी से इस तरह के मामले सामने आने के राष्ट्रपति ट्रम्प भी इस दवा के समर्थन में कूद पड़े।

उन्होंने भारत को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन प्रेष के लिए अप्रोक्षेन भी दे रखा था और इसके बाद भारत को अपनी नीति बदलकर अमेरिका को ये दवा भेजनी पड़ी थी। बताया गया है कि ट्रम्प ने इसके इस्तेमाल के लिए अपने देश की सबसे बड़ी नियंत्रक एजेंसी एफडीए पर भी दबाव बनाया।

भारतीय दवा की गुणवत्ता सवाल सवाल भी

अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ। रिक ब्राइट ने बीते दिनों देश के विशेष काउंसिल कार्यालय में भारत से पहुंची हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की गुणवत्ता पर शिकायत दर्ज कराई थी। कहा गया था कि ट्रम्प प्रशासन के स्वास्थ्य अधिकारियों को भारत से मिल रही कम क्वालिटी वाली मलेरिया की दवा खासकर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर आगाह किया गया था।

डॉ। ब्राइट वर्तमान में सेवा से हटा दिए गए हैं। इससे पहले वे बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च डेवलपमेंट अथॉरिटी के प्रमुख थे। यह अमेरिका के स्वास्थ्य और ह्यूमन सेवाओं (एचएचएस) विभाग की देखरेख में काम करने वाली शोध एजेंसी है।

कोई रामबाण दवा नहीं, वैज्ञानिक तौर पर हो रही है

यह अवलोकन आधारित स्टडी थी जिसमें हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और प्लेसिबो (कोई दवा नहीं) वाले रोगियों के समूह की तुलना की गई थी। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि इसके निष्कर्ष रोगियों और उनके परिवारों को उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि, “यह निराशाजनक है कि महामारी में इतने महीनों के बाद भी हमारे पास कोई भी इलाज में है, कोई रामबाण दवा इस्तेमाल करने के संतुष्ट करने वाले परिणामजे नहीं है।”





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