• चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, इजरायल और नीदरलैंड ने वैक्सीन या कंप्यूटर बनाने का दावा किया
  • मीडिया में पत्रों, वैक्सीन बनाने और इलाज की औसतन हर दूसरे दिन एक नई खबर आ रही है

दैनिक भास्कर

10 मई, 2020, सुबह 06:01 बजे IST

रिर्सच डेस्क। कोरोना महामारी को फैले 130 दिन हो चुके हैं। इस दौरान पूरी दुनिया में 40 लाख से ज्यादा लोग कोरोना से हानिकारक हो चुके हैं। 2.7 लाख लोगों की जान जा चुकी है। कोरोना की रोकथाम के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता पहली सफलता के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं।

कोरोना, जिसे मेडिकल भाषा में SARS-CoV-2 भी कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, इस महामारी की रोकथाम के लिए वर्तमान में दुनिया की 102 संस्थाओं को वैक्सीन खोजने में जुटी हुई हैं। 120 संभावित टीकर्स के परीक्षण भी चल रहे हैं। इस काम में 80 से ज्यादा देशों की मेडिकल संस्थाएं सयुंक्त रूप से भी शोध में लगी हैं।
भारत, जर्मनी, अमेरिका की स्वास्थ्य संस्थाएँ एक साथ मिलकर अनुसंधान कर रही हैं। चीन ने सबसे पहले 4 मार्च, अमेरिका ने 24 मार्च, ब्रिटेन ने 21 अप्रैल, इजराइल ने 5 मई, इटली ने 6 मई और नीदरलैंड्स ने 7 मई को वैक्सीन या कृषि बनाने का दावा किया। दुनिया की मीडिया में भी कोरोना की, वैक्सीन बनाने की और इलाज की औसतन हर दूसरे दिन एक नई खबर आ रही है।

  • चीन- मिलिट्री मेडिकल साइंस अकादमी ने सबसे पहले वैक्सीन बनाने का दावा किया

4 मार्च को चीन से खबर आई कि 53 साल की शेन वेई के नेतृत्व वाली टीम ने मिलिट्री मेडिकल साइंस अकादमी में कोरोना से बचने की वैक्सीन बनाने में कामयाबी पाया है। यह चीन की प्रतिष्ठित अकादमी है, जिसमें 26 विशेषज्ञ, 50 से ज्यादा वैज्ञानिक और 500 से ज्यादा अनुभवी लोग काम करते हैं। इसके अलावा चीन की तीन अन्य कंपनियों कैनसिनो बायोलॉजिक्स, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स, सिनोवेक बायोटेक ने भी दावा किया कि वे वैक्सीन के ट्रॉयल के पहले चरण में हैं। सिनोवेक बायोटेक तो इंसानों पर ट्रॉयल करने का दावा भी कर रहा है।

  • अमेरिका- फार्मास्युटिकल कंपनी मोडर्ना ने कहा- 2020 के अंत तक बनने लगेगी वैक्सीन

अमेरिका की फार्मास्युटिकल कंपनी मोडर्ना कोविड -19 के टीके की टेस्टिंग पर काम कर रही है। कंपनी ने 24 मार्च को ऐलान किया कि वो 2020 के अंत तक टीके बनाने लगेगी। फाइजर, जाॅनसन और जाॅनसन भी वैक्सीन पर शोध कर रहे हैं। इसके अलावा गिलियड साइंसेज कंपनी ने रेमदेसीवर नामक दवा बनाई है, जिसे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के बाद कोरोना से बचने की अब तक की सबसे प्रभावी दवा मानी जा रही है। 6 मई को जापान ने भी इसे मान्यता दी थी।

  • ब्रिटेन- 23 अप्रैल से वैक्सीन का ट्रायल शुरू हुआ, वैज्ञानिकों को 80 प्रतिशत सफलता की उम्मीद है

लंदन में कोरोना वैक्सीन पर काम कर रहे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने 23 अप्रैल को टीके के परीक्षण का दावा किया। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग दवा खोजने की कोशिश में हर संभव प्रयास कर रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं को 2 करोड़ पाउंड की राशि उपलब्ध कराई गई है। वहीं, टीका बनाने वाले वैज्ञानिकों ने 80 प्रति सफलता की उम्मीद जताई।

  • इजरायल- आईआईबीआर ने साइटक्लोन तरीके से वायरस पर हमला करने वाली दवा विकसित की है

5 मई को तेल अवीवी से खबर आई कि इजरायल इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल रिसर्च (आईआईबीआर) ने एक ऐसी दवा बनाने में कामयाबी हासिल की, जो मोनोक्लोन तरीकों से कोरोनावायरस पर हमला करती है। इजराइल के रक्षा मंत्री नैफ्टली बेनेट के मुताबिक, मोनोक्लोनल तरीके यानी यह व्यक्ति के शरीर के अंदर ही वायरस को मारने में सक्षम है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि वैक्सीन का ट्रायल इंसानों पर हुआ है या नहीं।

  • इटली- टाकिज बॉयोटेक ने दावा किया था कि उसकी वैक्सीन सबसे एडवांस स्टेज पर हैं

6 मई को रोम से खबर आई कि टैकिज बॉयोटेक ने एक ऐसे टीके का विकास किया है, जो टेस्टिंग के सबसे एडवांस स्टेज पर है। टैकिज के सीईओ लुईगी ऑर्किचियो ने इटैलियन न्यूज एजेंसी एट्सए को बताया कि इस वैक्सीन का जल्द ही ह्यूसमन टेस्ट किया जाएगा। इस वैक्सीन से चूहों में विकसित विकसित गए हैं। विकसित वायरस को कोशिकाओं पर हमला करने से रोकती है। दावा किया गया कि यह इंसान की कोशिकाओं पर भी काम करता है।

  • नीदरलैंड: 47D11 को कोरोनावायरस के स्पीक प्रोटीन को ब्लॉक करने में सक्षम कहा जाता है

नीदरलैंड्स में यूट्रेच्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 47D11 को एक ऐसे व्यक्ति की खोज की है, जो कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन को जकड़कर ब्लॉक कर देता है, क्योंकि कोरोना शरीर में संक्रमण फैलाने के लिए इसी तरह स्पार्क प्रोटीन – कोशिकाओं को जकड़ता है। शोधकर्ताओं ने रायपुर में अलग-अलग कोरोनावायरस के स्पक प्रोटीन को चूहे की कोशिकाओं में कैंसर किया। इसमें SARS-CoV2, सार्स और मर्स के वायरस भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने कोरोना को हराने वाली चूहे की 51 टनज अलग की। इनमें से सिर्फ 47D11 के नाम की ऐसी थी जो संक्रमण को रोकने में सफल थी।

  • भारत: कुछ संस्थानों सहित वर्तमान में टीके के परीक्षण में जुटे हैं

भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संस्थान (CSIR) कोविद -19 के टीके का परीक्षण कर रहे हैं, इसके अलावा अहमदाबाद की दवा कंपनी हेस्टर बायोसाइंसेज ने 22 अप्रैल को घोषणा की थी कि वह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी के साथ मिलकर कोरोना काेक विकसित करेगी। । गौरतलब है कि इससे पहले पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ने दावा किया था कि वह सितंबर-अक्टूबर तक कोरोना काoc बारे मेंगी, जिसकी कीमत लगभग 1000 रुपये होगी।

दो तरीकों की चर्चा हो रही है-

  • प्लाजमा थेरेपी चिकित्सकों के अनुसार, जो व्यक्त करते हैं एक बार कोरोना होता है, अगर वह ठीक हो जाता है तो उसके रक्त में शिशुज विकसित हो जाता है। इस तरह के लोगों के ब्लड से प्लॉ न निकालकर अन्य कोरोना मरीज को दिया जाता है तो उसके ठीक होने की उम्मीद रहती है। इस ट्रीटमेंट स्ट्रेटजी पर अमेरिका के साथ-साथ भारत में भी काम हो रहा है।
  • एंटीबॉडी- ये प्रोटीन से बनीं खास तरह की इम्यून कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें बी-लिम्फोसाइट कहते हैं। जब भी शरीर में कोई बाहरी चीज (फोरेन बॉडीज) पहुंचती है तो ये प्रकट हो जाते हैं। बैक्टीरिया या वायरस को तटस्थ सिद्ध करने का काम यही सूरज करता है। इस तरह ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे हर तरह के रोगाणुओं का असर बेअसर हो जाता है।

दो दवाएं, जो बटोरी सबसे ज्यादा सुर्खियां-

  • हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन– यह सबसे चर्चित दवा है। इसे कोरोना के इलाज के इस्तेमाल किया जा रहा है। यह दवा मलेरिया बुखार में रोगी को दी जाती है। गत दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से इस दवा की मांग की थी, जिसके बाद कोरोना से सामना के लिए 45 देशों ने भारत से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा की मांग की। भारत ने 30 देशों को इस दवा की सप्लाई के लिए स्वीकृति भी दी।
  • रेमडेसिवीर– यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो मेडिसिन के शोधकर्ताओं के अनुसार कोरोना के इलाज के दौरान 125 लोगों को रेमडेसिर दवा दी गई, जिसके बाद उनके सेहत में तेजी से सुधार देखा गया। हालांकि अभी तक अमेरिका की बायो कंपनी कंपनी गिलेंड साइंस ने इसकी क्लीनिकल टेस्टिंग शुरू कर दी है। नतीजे आने तक इसे ट्रायल दवा के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल इबोला के इलाज के लिए भी किया गया है।





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