• पहने पहनने के कारण 75 लाख की आबादी वाले हॉन्गकॉन्ग में कोरोना से सिर्फ 4 मौतें हुईं, 1038 लोगों की मौत हुई
  • 17 साल पहले सार्स का कहर झेल चुके हॉन्गकॉन्ग ने वर्क पर भरोसा जताया, जबकि पश्चिमी देशों में बहस चल रही है।
  • महामारी फैलने के साथ ही प्रशासन ने सभी को मुखौटा पहनना और हर दो घंटे में हाथ धोना अनिवार्य किया था

दैनिक भास्कर

02 मई, 2020, 03:44 PM IST

ऐलेन यू। विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन में कोरोना से बचने का सबसे अच्छा विकल्प सोशल डिस्टेंसिंग, बार-बार हाथ धुलना और चेहरे पहनना है। दुनिया में जब तक ये तीनों विकल्प पर पूर्ण रूप से अमल किया जाता है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस सबके बीच चीन से लगे एक छोटे से देश हॉन्गकॉन्ग ने लोगों की सुरक्षा के लिए सक्रियता दिखाई। रातोंरात स्कूल बंद कर दिया, शहर में डाक दी गई कि हर दो घंटे में हाथ धोते रहें। घर से बाहर निकलने पर फेस मास्क जरूर मिलते हैं। लोग भी पीछे नहीं रहे।

हांगकांग में अक्सर पहनने का आंकड़ा 100% दर्ज किया गया। नतीजा सबके सामने है। 75 लाख की आबादी वाले इस देश में कोरोना से सिर्फ 4 जानें गईं। 1038 भिन्ननों में से 830 लोग स्वस्थ भी हो चुके हैं। देशवासियों को सर्जिकल फैस की कमी न पड़े, इसके लिए यहां के जेल में बंद कैदी हर महीने 25 लाख फंक्शन कर रहे हैं। इस दौरान पश्चिम देशों में मुख की जरूरत और उसकी क्षमता पर ही बहस होती रही और कई सप्ताह इसी तरह निकल गए।

17 साल पहले आए सार्स महामारी से हॉन्गकॉन्ग के लोगों ने सबक सीखा
हॉन्गकॉन्ग के लोगों ने वर्क पर भरोसा इसलिए जताया, क्योंकि 17 साल पहले सार्स महामारी ने यहां कहर बरपाया था। इससे सबक लेते हुए यहां प्रशासन ने व्यापक स्तर पर कामकाज बनाने का काम शुरू किया। हॉन्गकॉन्ग के सर्वव्यापी पहलुओं के पीछे की कहानी भी काफी अनोखी है।

दरअसल, हॉन्गकॉन्ग में लाखों की संख्या में सर्जिकल फंक्स यहां के कैदी बना रहे हैं, जिनमें से कई तो अतिरिक्त पैसों के लिए देर रात तक काम कर रहे हैं। चीन से लगने वाली सीमा पर मध्यम स्तर की सुरक्षा वाली लो वु जेल में फरवरी से 24 घंटे फ़ंक्शन बनाने का काम चल रहा है। कैदियों के साथ-साथ रिटायर्ड कर्मचारी और काम से छूटने वाले अधिकारी भी अक्सर बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। महामारी के हांगकांग पहुंचने से पहले यहां हर महीने 11 लाख फंक्शन तैयार किए जाते थे।

2018 में कैदियों द्वारा बनाए गए सामानों की कीमत 432 करोड़ रुपए थी

  • हॉन्गकॉन्ग के कैदी जेल में अपना समय काम करते हुए बिताते हैं, जिससे न केवल उनके आलस और तनाव में कमी आती है, बल्कि काम से मिले पैसे से उन्हें अपने पुनरारंभ में मदद मिलती है। यहां 4000 से अधिक कैदी हर साल ट्रैफिक चिह्न, पुलिस की वर्दी, अस्पताल के कपड़े और सरकारी दफ्तरों में दी जाने वाली चीजें तैयार हैं।
  • 2018 में कैदियों द्वारा तैयार किए गए सामानों की कीमत 432 करोड़ रुपए आंकी गई थी। कैदी पूरी रात या अतिरिक्त शिफ्टों में यह काम स्वैच्छिक रूप से करते हैं। इसके लिए उन्हें ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि दो साल की सजा पूरी कर पिछले ही महीने जेल से निकलीं यानीस कहती हैं कि उसे रोज की मजदूरी 4.30 डॉलर थी, जो हॉन्गकॉन्ग में तय न्यूनतम मजदूरी का आठवां हिस्सा था।
  • हॉन्गकॉन्ग ह्यूमन राइट्स डिपार्टमेंट के निदेशक लॉ युक-काई कहते हैं कि समाज की अत्यावश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए इस तरह के सस्ते श्रम पर निर्भरता ठीक नहीं है। कैदी हमारी जरूरतों की पूर्ति के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं, तो उन्हें उनके काम का मामूली मेहनताना नहीं देना चाहिए।





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