• हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में साइकालेलाजी के लेक्चरर राबेतराआ ओलार्डिया के अनुसार, लगभग 1% बच्चे मास्काफाएबिया से पीड़ित हाए सकते हैं।
  • ओलर्डिया के कहते हैं, 6 साल से छोटे बच्चों में चेहरा पहचानने की शक्ति कम हातीती है, इसलिए संकाय उन्हें डरा है

दैनिक भास्कर

02 मई, 2020, 12:24 अपराह्न IST

वॉशिंगटन। (पेरी क्लास, एमएड).काएराएना संक्रमण के दाैर में एक महीने में लाेगाें की जीवनशैली में शामिल हुए संकाय काे धूपकें ने ताे अपना लिया है, लेकिन बच्चाें के लिए यह किसी खाएफ से कम नहीं है। कई बच्चाें काे यह डरा सकता है। मुखाबैटाें से डरने वाले बच्चों को काे लेकर ऐसी ही प्रतिक्रिया कर सकते हैं। ऐसे में बड़ा संकट बच्चों के चेहरे से परिचित करवाना है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में साइकालेलाजी के लेक्चरर राबेताराए ओलार्डिया कहते हैं, मा करीब एक प्रतिशत बच्चे मास्काफाबेबिया से पीड़ित हाए सकते हैं। यह ऐसा डर है, जाे बच्चेें में छह महीने तक रह सकते हैं। यह कास्ट्यूम और सुपरहीराए से भी जुड़ा हाए है।)

हालांकि, कई बच्चे अपने माता-पिता काे फेस पहने देखकर डर सकते हैं।

छातेे बच्चें में चेहरा पहचानने की शक्ति कम हाएती है- प्रो। कोंग ली
बच्चाें के फेस पहचानने के काॅसिल के विकास का अध्ययन करने वाले टाेरंटाए यूनिवर्सिटी के प्राे। कांग ली के कहते हैं, संकाय से डरने का एक कारण चेहरा न पहचान पाना हाे सकता है। छातेे बच्चें में चेहरा पहचानने की शक्ति कम हातेती है। छह साल की उम्र से बच्चोंें में यह काॅसिल विकसित हाेता है। 14 साल की उम्र तक वे व्यस्केंड जैसे कालैल तक पहुंच पाते हैं। छह साल से कम उम्र के बच्चे किसी व्यक्ति के पूरे चेहरे काे पहचानने की बजाय चेहरे की किसी विशेषता से याद रख रहे हैं। जैसे नाक के आकार, आंख के प्रकार आदि।

बच्चों के सामने चेहरे उतारें और पाते हैं- डायरेक्टर मोंडलोक
ओंटारिए स्थित ब्राक यूनिवर्सिटी में फेस परसेप्शन एमबीए की डायरेक्टर कैथरीन जे। माण्डलेक के मुताबिक, बच्चेें के सामने बार-बार फंक्शन उतारते हैं और पाते हैं, ताकि वे पहचान सकें कि आप उनके माता-पिता हैं।

डॉ। विलार्ड ने कहा- फोबिया के इलाज के लिए एक्सपोजर थेरेपी बेहतर है

कैंब्रिज में साइकैथेरेपिस्ट डाॅ। क्रिस्टाएफर विलार्ड कहते हैं, े फाएबिया के इलाज के लिए एक्सपैसर थापर बेहतर है। परिजन कार्य से पहचान प्रदान करने की अनापत्ति विधि अपना सकते हैं। मज़े चित्राें वाले पहलू उन्हें दें। उन्हें अपना वर्क डिजाइन करने दें। इससे जुड़े क्राफ्ट एक्ट में भी करवा सकते हैं। उन्हें पहनने और उतारने का अभ्यास करते हैं। घर में घूमते-खेलते समय भी उन्हें पहनावे की आदत होती है। पहने हुए आँखों को इंगित करने के लिए उन्हें समझा जाता है और उन्हें भी उसी तरह संवाद करने के लिए कहें। ‘

डॉ। कोपलिवक्ज के मुताबिक, बच्चों को समझा जा सकता है कि डॉ और नूर हौर हैं

चाइल्ड माइंड इंस्टीट्यूट के प्रेसिडेंट डाए। हाराेल्ड काेपलिवक्ज कहते हैं, रा सुपरहीराए से संबंध होने के कारण भी मदद मिल जाएगी। उन्हें समझा जा सकता है कि डाक्टर और नूर हिे हैं, जाे लाेगाें की सुरक्षा करते हैं और मदद करते हैं। हम भी सुपरहीराए बन सकते हैं और वर्क पहनकर सेकेंड की रक्षा कर सकते हैं।)





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