29 अप्रैल को हुई बैठक में इस बात पर सहमति बन गई थी कि ओली की जगह किसी दूसरे नेता को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी दी जाएगी और ओली पार्टी की जिम्मेदारी संभाल लेंगे।

लेकिन ओली ने तब भी यह प्रस्ताव बेहद सफाई के साथ टाल दिया था कि अभी कोरोनासिस के इस गंभीर दौर में और खासकर लॉकडाउन की स्थिति में देश में नेतृत्व परिवर्तन करना ठीक नहीं होगा।

लेकिन उन्होंने खुद कहा कि कोरोनासिस खत्म होने के बाद और स्थितियां सामान्य होने के बाद वे खुद ही खुद को छोड़ देंगे।

लेकिन पार्टी के तमाम नेता और खासकर ओली विरोधी गुट इससे खफा है और चाहते हैं कि ओली तत्काल पद छोड़ दें। प्रचंड गुट बेहद सक्रिय तरीके से इस मुहिम में लगा है।

बुधवार की बैठक में तमाम सदस्यों ने ओली को इस बात के लिए घेरा भी था कि उन्होंने कैसे दो विधेयक बगैर किसी की सहमति के अफरा तफरी में पास करवा लिए और बाद में उन्हें अपने ही फैसले को वापस लेना पड़ा।

इससे पार्टी की और खासकर नेतृत्व की बहुत किरकिरी हुई है। मनमाने फैसले लेने के अलावा ओली पर भ्रष्टाचार के भी कुछ आरोप लगाए गए हैं।

लेकिन सत्ता के खेल में वर्तमान में ओली कम समर्थकों के बावजूद प्रचंड पर भारी पड़ रहे हैं। प्रचंड की कोशिश है कि उनकी पसंद का नेता पीएम बने, लेकिन ओली चाहते हैं कि अगर वो पद छोड़ दें तो उनकी जगह उनका ही कोई विश्वासपात्र पीएम बने।

इसी प्रकारमकश के बीच शुक्रवार से शुरू होने वाले संसद के बजट सत्र के हंगामेदार होने की आशंका जताई जा रही है। माना जा रहा है कि विपक्ष ने दोनों अध्यादेशों को लागू करने और फिर वापस लेने के मामले पर सत्ताधारी पार्टी और पीएम को घेरने की तैयारी में है।

साथ ही कोरोना की जंग में विशेष कामयाबी न मिलने को लेकर भी विपक्ष के तेवर गरम हैं।





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